जनसंख्या दिवस पर …

Advertisements

मुकाम तक आ पहुंचे…

आत्मविश्वास के अश्व पर,
अनुशासन की लगाम डाल,
निडरता की काठी पर,
धैर्य से हो सवार,
खींची जो लगाम तो,
मुकाम तक आ पहुंचे।

रोकेगा जमाना क्या ?
खींचेगा बाल की खाल,
दुनिया की रीति है,
घड़ी -घड़ी कर बवाल ,
बवालों को झेला तो,
मुकाम तक आ पहुंचे।

बाकी हैं आयाम और,
रुकेगें किसी न ठौर,
निराशा से जीतेगें,
करेगा जमाना गौर।
सोच ऐसी रखी तो,
मुकाम तक आ पहुंचे।

मैं ही सवार हूं,
चाबुक है मेरे हाथ,
टेढ़ी हो डगर अगर,
थोड़ी कर टेढ़ी चाल,
चलता रहा सफर तो,
मुकाम तक आ पहुंचे ।

ज्योति राय ‘ जीवन ज्योति’
लखनऊ

वो जो मेरे पापा थे…

वो, पिता जो अकसर व्यस्त दिखे,
अपने जीवन में मस्त दिखे।
चेहरे पर अकसर देखा है,
माथे पर चिंता रेखा है।

बच्चों के बचपन से खेला,
डाँटा डपटा फिर भी झेला।
वो तेज प्रचण्ड सी शैतानी,
बोला न कुछ,भृकुटी तानी ।

माँ की बड़ -बड़ को सुन लेते,
उलझन में भी बस हंस देते।
वो वरद हस्त जो पीठ पे था,
हम सब बच्चों का हौसला था ।

युगबोध कराती थी बातें,
कभी अनुशासन कभी सौगाते।
खामोशी भी कुछ कहती थी
हम नजर बचा कर हट जाते।

न तनिक जरा वो घबराते,
और न समाज से भय खाते ।
हम अरमानों के मोती थे,
उनकी ही जीवन ज्योति थे ।

ज्योति राय,’ जीवन ज्येाति’
लखनऊ

मेरे पिता…

विश्वास का गर खींचना हो खाका कोई,

चन्द लकीरों में खींचूं चेहरा तेरा।

घर की दीवारे आज भी है बोलती,

जिस भी कोने में बसेरा था तेरा ।

अपने अरमानों में हम बच्चों को ढाला,

मिल बाँट कर खाना सिखाया था निवाला।

मुश्किलों पर ढाल बन कर थे खड़े,

मान की खातिर जमाने से लड़े।

ज्योति राय ‘जीवन ज्योति’

लखनऊ

जल ही जीवन है..

जहाँ नदियाँ अपनी माता हैं,
हिमालय भाग्यविधाता है,
उस धरती पर बूंदें कम है,
और पीने का पानी कम है।

जहाँ पेड़ खड़े थे हरे भरे,
अब मॉल वहाँ पर हैं खड़े,
सरकार खड़ी है जाति पर,
और गाँवों में आँखें नम हैं।

ज्योति राय ,’ जीवन ज्योति ‘

नारी का मान…

नारी जन्मदात्री है।
समाज का प्रत्येक भावी
सदस्य उसकी गोद में पलकर
संसार में बड़ा होता है,
मुसीबतों के सामने,
डट कर खड़ा होता है।
उसका मान और सम्मान ,
हमारा कर्म है,
समाज का धर्म है।
स्वयं उसे ये अहसास नहीं,
उसके दिल का क्या,मर्म है।
वाणी से सम्मान दें,
आँखों से उसे मान दें,
हमारी ये परम्परा है,
भावी पीढ़ी को इसका ज्ञान दें।

ज्योति राय, ‘जीवन ज्योति’

चलना जीवन की है रीत..

जीवन एक लहर है,
उठती -गिरती,
आती -जाती,
कभी शांत ,
कभी इठलाती,
कभी उमंग से भरी हुयी सी,
कभी तरंग से लगे तरंगित,
तट पर आती
जोर लगाती,
आगे जाने की होड़ लगाती,
थक जाती,
वापस हो जाती,
फिर दुगने उल्लास से आती,
आदि अन्त सब पता है उसको,
फिर भी कभी हताश न होती,
शांत समंदर होता तब भी,
धीमी चाल लिये वो आती।
कर्म निरन्तर करती रहती,
ऊर्जा से लबरेज वो रहती,
आते जाते देती सीख,
चलना जीवन की है रीत।

ज्योति राय ,’जीवन ज्योति’

प्रकृति की पूजा ….

प्राचीन काल से संस्कृति में,

प्रकृति को पूजा जाता है।

इसके जीवन में जीवन है,

ये समझाया जाता है।

बेल पत्र के पर्णों से,

शिव जी की पूजा होती है।

तुलसी के पौधे की पत्ती,

विष्णु जी की प्रिय होती है।

केले के लम्बे पत्तों से,

सत्यनारायण का रिश्ता।

हल्दी की पीली गाँठों से,

पूजा पाठों की रीति है।

बेल का फल जो शिव फल है,

पाचन की उत्तम औषधि है।

तुलसी के पत्तों का सेवन

कफ और ज्वार की औषधि है।

हल्दी की गांठों का चूर्ण,

दर्द निवारण है करता।

इसी लिये इन पौधों से,

पूजा पाठों की रीति है।

वृक्ष लगना है हमको,

प्रकृति बचाना है हमको।

संकल्प करें हम सब मिल कर,

धरा बचाना है हमको।

ज्योति राय ,’जीवन ज्योति’

दिल से जियो…

उलझनों में उलझना क्या?

कुछ आपस में उलझ जायेगी,

कुछ सुलझ के ,सुलझ जायेगी।

मशरूफियत का रोना क्या?

वक्त हर एक के पास होता है,

इंसान वक्त न होने का रोना रोता है।

कुछ ख्वाब पूरे ना हुये तो क्या?

देखते रहिये और संजोते रहिये,

हर रात तारों को ख्वाब गिनाते रहिये ।

पाप और पुण्य के चक्कर में फंसना क्या?

इंसान एक परिंदा है ,उड़ते रहिये,

आसमान को कर्मों से नापते रहिये।

नश्वर हर जीव हैं,फिर मृत्यु से डरना क्या?

अनन्त खुशियाँ है ,अहसास करिये,

जीवन इनमें खोजिये, मुस्कुराते रहिये।

ज्योति राय ‘जीवन ज्योति’

Blog at WordPress.com.

Up ↑